रविवार, 28 जून 2009
मंगलवार, 23 जून 2009
रविवार, 21 जून 2009
शनिवार, 20 जून 2009
बुधवार, 3 जून 2009
झारखंड की इंटर परीक्षा में रसोइया टोपरविष्णु राजगढ़िया
रांची - झारखंड इंटरमीडिएट कौंसिल का इस वर्ष का परीक्षाफल चौंकाने वाला है। इंटरमीडिएट आटर््स में बेहतर प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों में बेहद निर्धन पृष्ठभूमि वालों की बड़ी संख्या है। राज्य में आइए का टॉपर बनना संजीत महतो एक रसोइये का काम करते हुए अपनी पढ़ाई करता रहा। वह पुरलिया जिले के मुरगुमा का रहने वाला है। वह एक अच्छा एथलीट भी है। वह एक किसान परिवार से आता है और परिवार काफी तंगहाली से गुजारा करता है। वह रांची के चुटिया स्थित ग्रेट इंडिया लॉज के मेस में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए खाना बनाकर अपना गुजारा चलाता है। उसे कुल 379 अंक मिले हैं। इतने ही अंक लाकर धनबाद जिले के मैथन की फौजिया रहमान भी संयुक्त टॉपर बनी है। सेकेंड टॉपर नरगिस नाज के पिता गांव में ही एक छोटी सी खाद की दुकान चलाते हैं। नरगिस रांची जिले के चान्हो स्थित वीर बुधु भगत इंटर कॉलेज की छात्रा है।थर्ड टॉपर नीलम केरकेट्टा की मां ने लोकल ट्रेन में बैर-जामुन बेचकर बेटी को पढ़ाया और आज मां-बेटी खुश है कि शिक्षा के जरिये भविष्य संवर जायेगा। नीलम ने लापुंग थाना क्षेत्र के एक सुदूर गांव से प्रतिदिन साइकिल से दस किलोमीटर दूर लुथरेन इंटर कॉलेज आकर पढ़ाई की। राज्य की चौथी टॉपर सलमा खातून के पिता जुम्मन खां एक्साइज विभाग में ड्राइवर के बतौर कार्यरत हैं। सलमा रांची के उर्सलाइन इंटर कॉलेज की छात्रा है।राज्य की पांचवीं टॉपर रंजु कुमारी के पिता संतोष उरांव का 2003 में निधन हो गया था। इसके बाद रंजु की मां फागुनी देवी ने हड़िया बेचकर उसे पढ़ाया। रामगढ़ कॉलेज की रंजू कुमारी ने शादी के बाद भी अपनी पढ़ाई जारी रखकर यह मुकाम हासिल किया है। कोल्हान क्षेत्र में सेकेंड टॉपर का स्थान हासिल करने वाला शत्रुघन महतो हाट-बाजार में जूते-चप्पल बेचकर गुजारा चलाता है।
नई दुनिया, 04.06.2009 पेज 11
नई दुनिया पत्रिका 14 जून 2009
http://epaper.naidunia.com/Details.aspx?id=66037&boxid=107939680
मंगलवार, 2 जून 2009
विष्णु राजगढ़िया
नई दुनिया पत्रिका, 31 मई 2009 पेज 32 पेज 33
झारखंड ने देश को महेंद्र सिंह धौनी जैसा क्रिकेट कप्तान दिया है। हॉकी और तीरंदाजी में भी इस राज्य के खिलाड़ियों ने देश का नाम रोशन किया है। वर्ष 2003 में जब झारखंड को 34 वें नेशनल गेम का दायित्व सौंपा गया तो खिलाड़ियों व खेलप्रेमियों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी थी। उस वक्त 2007 में इसके आयोजन का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन पांच बार तिथि टलने से पूरे उत्साह पर पानी फिर गया है।
नेशनल गेम हर दो साल पर किसी एक राज्य में कराने का प्रावधान है। नेशनल गेम का उद्देश्य देश में खेल प्रतिभाओं को उभारना, सभी राज्यों में खेल संस्कृति और अधिसंरचना का विकास करना और अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में देश का नेतृत्व करने योग्य खिलाड़ियों को सामने लाना है। लेकिन तथ्य बताते हैं कि हाल के वर्षों में भारतीय ओलंपिक संघ इस दिशा में नाकाम रहा है। इसका खामियाजा देश की खेल प्रतिभाओं को भुगतना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर की स्पर्धाओं में भारत लगातार पिछड़ रहा है। हर असफलता के बाद घड़ियाली आंसू बहाये जाते हैं लेकिन नेशनल गेम के आयोजनों को गंभीरता से कराने को कभी प्राथमिकता के बतौर नहीं लिया जाता।
शनिवार, 23 मई 2009
शिबू के लिए मुश्किल है सरकार बनाना
झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन काफी दुविधा में हैं। उन्हें भरोसा था कि विधायक बन गये तो मुख्यमंत्री भी बन जायेंगे। इसके लिए जामताड़ा के विधायक विष्णु भैया से इस्तीफा दिलाकर एक सुरक्षित सीट का इंतजाम किया गया। इस सीट पर उपचुनाव में श्री सोरेन जीत भी चुके हैं। इसके बावजूद झारखंड में अब सरकार बनने की कोई उम्मीद नहीं रह गयी है। शिबू सोरेन ने दुमका लोकसभा सीट भी जीती है। अब उन्हें तत्काल तय करना है कि किसी भी वक्त भंग होने की ओर बढ़ रही विधानसभा के सदस्य बनें अथवा दुमका से सांसद रहें। दोनों में से एक सीट उन्हें 31 मई तक छोड़नी है।
Nai Dunia, Delhi 20-05-09 page 6
रविवार, 17 मई 2009
विष्णु राजगढ़िया
झारखंड में नक्सलियों ने एक नये राजनीतिक प्रयोग किया है। पलामू संसदीय क्षेत्र से झामुमो के टिकट पर नक्सली कमांडर कामेश्वर बैठा ने संसद में प्रवेश किया है। इस जीत को नक्सलियों की बदली रणनीति का प्रतीक माना जा रहा है। जेल में बंद श्री बैठा ने झामुमो प्रत्याशी के बतौर चुनाव भले ही लड़ा हो, इसे झामुमो की जीत के बतौर नहीं देखा जा रहा। झामुमो को अपने मजबूत जनाधार वाली राजमहल, गिरिडीह और जमशेदपुर सीटें गंवानी पड़ी है। अकेले शिबू सोरेन अपनी दुमका सीट बचा सके हैं। वैसे भी पलामू संसदीय क्षेत्र में कभी झामुमो का जनाधार नहीं रहा। कामेश्वर बैठा की जीत उनकी अपनी जीत है। इस जीत के अपने कारण और अपने मायने हैं। नक्सलियों की मदद के बगैर यह जीत संभव नहीं थी।
नई दुनिया, 18 मई 2009 पेज सात
गुरुवार, 7 मई 2009
झारखंड में नेशनल गेम्स का भी दम फूला - विष्णु राजगढ़िया -
[उन अनजाने खिलाडयों के लिए, जो अवसर से वंचित रह गये]
उसे तो जख्म देना और तडफाना ही आता है।
गला किसका कटा, क्यूंकर कटा, तलवार क्या जाने?
जी हां, यही प्रकृति होती है शासन की। उसे इससे क्या मतलब कि उसके गलत तौर-तरीकों, मनमाने फैसलों और उनकी नाकाबिलियत का शिकार कितने लोगों को कितने रूपों में होना पड रहा है।
झारखंड में ३४ वें नेशनल गेम वर्ष २००७ में ही होने थे। वर्ष २००३ में ही इसके लिए हरी झंडी मिल चुकी थी। लेकिन चार बार नेशनल गेम की तिथि टल चुकी है। अगली तिथि पर भी नेशनल गेम हो सकेंगे या नहीं, कहना मुश्किल है। इस दौरान नौ की लकडी नब्बे खर्च की तर्ज पर बडे-बडे विज्ञापन देने और होर्डिंग लगाने वाले तमाम नेता व अधिकारी अब मुंह चुराते चल रहे हैं। २०० करोड के बदले हजार करोड से ज्यादा खर्च हो गया, इस पर विधानसभा की समिति भी बन गयी, समिति ने रिपोर्ट में गंभीर सवाल भी उठाये, फिर भी कुत्ते की पूंछ टेढी की टेढी ही रही।
मंगलवार, 5 मई 2009

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. ज्यां द्रेज एवं सामाजिक कार्यकत्र्ता रितिका खेरा के नेतृत्व में खूंटी जिले में नरेगा संबंधी कार्यों का सर्वेक्षण चल रहा है।
5 मई 2009 को जिला खूंटी में नरेगा सर्वे एक की शुरूआत अजीब सी रही। सर्वे टीम को कहीं भी चालू नरेगा कार्यस्थल देखने को नहीं मिला ।
इस सर्वे टीम में दिल्ली एवं अन्य विश्वविद्यालयों से आए छात्रों के साथ स्थानीय वालंटियर शामिल हैं। 5 मई को तीन टीमों ने अपना काम तीरला, हस्सा और सिलादोन ग्राम पचायत में शुरू किया। ग्राम पचायत तीरला में, टीम एक गांव से दूसरे गांव भागते रहे लेकिन उन्हें गांव सिम्बूकेल के अलावा कहीं भी ऐसा कोई नरेगा कार्यस्थल नहीं मिला जहां काम चल रहा हो। उन्हें बताया गया कि ज्यादातर काम पूरे हो चुके हैं। इसे प्रखंड दस्तावेजों से सत्यापित किया जा रहा है। सिम्बूकेल की इस कार्यस्थल पर पिछले डेढ महीने से काम बन्द था क्याोकि वहां कई मजदूरो को मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ था ।
ग्राम पंचायत हस्सा की टीम, जिसकी अगुवाई डा० अनीरबन कार (दिल्ली स्कूल आॅॅफ इकोनोमिक्स से) कर रहे है, को कहा गया कि एक दिन पहले आयी बारिश की वजह से नरेगा कार्यों में अवरोध पैदा हो गया । इसमें कितना सच है यह तो समय ही बताएगा।
ग्राम पचायत सिलादोन में, अपरना जाॅन (केरल से आई) के संचालन में टीम को एक नरेगा कार्यस्थल मिला जहां कार्य चालू था। इस कार्यस्थल को ढूंढने में फागु सिंह (प्रधान, चुकरू) ने टीम की मदद की, जो कि टीम के सदस्य है। हांलाकि सिलादोन में अन्य किसी स्ािान पर नरेगा कार्यो के चालू होने का कोई निशान नहीं मिला फिर भी खोज जारी है । नरेगा सर्वे टीम के सदस्यों को नरेगा संबंधित सरकारी दस्तावेज प्राप्त करने में कुछ हद तक सफलता मिली ।
“हर हाथ को काम मिले” नारे के तहत जारी हुए “रोजगार अधिकार अभियान” में जिला प्रशासन द्वारा की गई पहल के बावजूद ऐसी स्थिति होना निराशाजनक है। अभियान किस मुकाम तक होगा यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा ।
दूसरी ओर, टीम ने पाया कि लोग नरेगा में काम करना चाहते है, बशर्ते समय पर भुगतान हो, और नरेगा के तहत तैयार किये जाने वाले संसाधनो की भी मांग है। कल और परसों की बारिश और तूफान के बावजूद तिरला गावं से बुदूदी गांव को जाने वाली मुरम सड़क (नरेगा के तहत बनी) साफ और अच्छी दशा में मिली। ऐसी स्थिति में नरेगा सुचारू रूप से चले यह सुनिश्चित करना होगा।
नरेगा सहायता केन्द्र, खूंटी द्वारा जारी (9608460736)
सोमवार, 4 मई 2009
छोटी मछलियां जेल में, लालू-जगन्नाथ के मामलों में खामोशी
शेष पेज 13 पर
पांच मामलों के 1300 गवाहों के बयान दर्ज नहीं, सीबीआइ की भूमिका पर उठते रहे सवाल
विष्णु राजगढ़िया
: भारत के सबसे बड़े पशुपालन घोटाले के 30 मामलों में 710 अभियुक्तों को सजा सुनायी जा चुकी है. लालू यादव एवं जगन्नाथ मिश्र से जुड़े पांच मामलों की सीबीआइ अदालत में सुनवाई काफी धीमी है. इन पांच मामलों में लगभग 300 कर¨ड़ के घोटाले का आरोप है. इन पांच मामलों में कुल 2295 गवाह हैं लेकिन अब तक महज 995 गवाहों के बयान दर्ज कराये गये हैं. शेष 1300 गवाहों के बयान दर्ज कराने के मामले में सीबीआइ की असफलता के कारण पांचों मामलों में लालू प्रसाद और डाॅ जगन्नाथ मिश्र सहित अनगिनत ऐसे अभियुक्तों को राहत मिल रही है, जिन्हें चारा घोटाले का मास्टरमाइंड समझा जाता है.
Nai Dunia, Delhi Page One, 05-05-2009
शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009
विष्णु राजगढ़िया
नई दुनिया, 25 अप्रैल, पेज 11
दस दिनों से झारखंड के छह जिले नक्सलियों की गिरफ्त में हैं। ग्रामीणों की नजर में यह नक्सल कफर्यू है। राष्ट्रपति शासन में कानून व्यवस्था की इस भयावह स्थिति से नागरिक भयभीत हैं।
गुरुवार, 23 अप्रैल 2009
लोकतंत्र के लिए सवाल बना सुगनू गांव
विष्णु राजगढ़िया
रांची: कांके प्रखंड के सुगनू गांव ने आज मतदान का बहिष्कार करके लोकतंत्र के सामने चुनौती खड़ी कर दी है. सैनिक छावनी के लिए आसपास की जमीनों का अधिग्रहण होने के बाद सुगनू गांव तक पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं है. चालीस साल से गांव के लोग इसके लिए आवाज उठा रहे हैं. उन्हें सैनिक छावनी के अंदर से गुजरने के दौरान सैनिकों द्वारा शारीरिक और मानसिक यातना का शिकार होना पड़ता है. इस बार ग्रामीणों ने मतदान बहिष्कार की घोषणा करते हुए कल गांव में पोलिंग पार्टी को घुसने से रोका . इस क्रम में पुलिस ने लाठी और ग¨लियां चलायी जिसमें तीन ग्रामीणों को गोलियां लगीं
नई दुनिया, 24 अप्रैल 2009
मंगलवार, 21 अप्रैल 2009
रविवार, 19 अप्रैल 2009
शनिवार, 18 अप्रैल 2009
माओवादी प्रवक्ता आजाद ने लंबे इंटरव्यू में उड़ाया मजाक
विष्णु राजगढ़िया
नई दुनिया, 18.04.09 पेज 11
शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009
विष्णु राजगढ़िया
झारखंड आंदोलन के भीष्म पितामह अस्पताल की शैया पर पड़े हैं। दो महीने से शिबू सोरेन को रांची, बोकारो और दिल्ली के अस्पतालों के सीसीयू में भरती रहना पड़ रहा है।
गुरुजी के बेटे दुर्गा सोरेन और झामुमो के चार वर्तमान सासंदों के बीच मतभेद गहराये
नई दुनिया, 11 अप्रैल 2009, दिल्ली पेज छह
गुरुवार, 9 अप्रैल 2009
चुनावों से स्कूलों पर आफत, बच्चे बेहाल
विष्णु राजगढ़िया
रांची: लोकतंत्र का महापर्व चुनाव झारखंड में स्कूलों और बच्चों के लिए कहर बनकर आया है।
- नक्सली उड़ा रहे गांवों में स्कूल
- पुलिस ने स्कूलों में कैंप बनाया
- प्रशासन ने स्कूल बसें जब्त कीं
- 15 दिन बंद रहेंगे स्कूल
नई दुनिया, 10.04.09 पेज दस
मंगलवार, 7 अप्रैल 2009
दुविधा के मारे, चार एक्स-सीएम बेचारे
प्रदेश की राजनीति करें या केंद्र की, तय नहीं कर पा रहे शिबू, अर्जुन, कोड़ा, मरांडी
-विष्णु राजगढ़िया
नई दुनिया, 08.04.2009, नई दिल्ली
शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009
जेल से संसद पहुंचने की फिराक में दो पूर्व नक्सली
विष्णु राजगढ़िया
- चतरा से माले के टिकट पर केश्वर यादव उर्फ रंजन यादव उर्फ दिनकर जी
- पलामू से झामुमो के टिकट पर कामेश्वर बैठा
नई दुनिया 04.04.2009, नई दिल्ली
मंगलवार, 31 मार्च 2009
सोमवार, 30 मार्च 2009
झारखंड: जदयू-भाजपा में बढ़ी दरार
नई दुनिया, दिल्ली- 30 मार्च 2009
